
कोरबा | नगर पालिक निगम कोरबा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए शहर के निवासी दीपक धामेचा ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को चार पन्नों का शिकायत पत्र सौंपकर निगम आयुक्त आशुतोष पाण्डेय सहित संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि उनके परिवार को व्यक्तिगत रंजिश के चलते निशाना बनाया जा रहा है। दुकान सील करने, संपत्तियों पर लगातार नोटिस जारी करने, पुलिस के माध्यम से परेशान करने और भवन तोड़ने की धमकी देने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना बाकी है।
दुकान सील करने से शुरू हुआ विवाद, 15 नोटिस जारी करने का दावा
शिकायत के अनुसार, 30 जुलाई 2026 को नगर निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों ने दीपक धामेचा की दुकान के पास कचरा हटाने को लेकर दबाव बनाया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसी दौरान उन पर एक हजार रुपये जुर्माना वसूलने का प्रयास किया गया और दुकान सील करने की धमकी दी गई।
दीपक का दावा है कि इसके बाद 5 अगस्त 2026 से उनके परिवार की संपत्तियों पर लगातार नोटिस जारी किए जाने लगे। उन्होंने शिकायत में लगभग 15 नोटिस मिलने की बात कही है। आरोप है कि 6 अगस्त की रात उनकी दुकान को बिना पूर्व सूचना के सील कर दिया गया। बाद में महापौर के हस्तक्षेप के बाद टैक्स जमा कर दुकान खुलवाए जाने की बात भी शिकायत में कही गई है।
चार खसरों की जमीन पर बने भवनों को लेकर विवाद
दीपक धामेचा ने अपनी शिकायत में खसरा नंबर 670/1, 109/2, 188/1/घ/4 और 141/5/3 की जमीन का उल्लेख किया है। उनका दावा है कि ये जमीनें पंजीकृत एवं डायवर्टेड हैं तथा इन पर बने भवनों को लेकर पहले भी संबंधित अधिकारियों को दस्तावेज और जवाब दिए जा चुके हैं।
शिकायतकर्ता के अनुसार, कुछ भवनों का नियमितीकरण पहले हो चुका है, जबकि खसरा नंबर 109/2 पर बने भवन के नियमितीकरण के लिए वर्ष 2023 में आवेदन किया गया था। इसके बावजूद लगातार नोटिस भेजे जाने पर उन्होंने सवाल उठाया है कि यदि निर्माण में कोई अनियमितता थी, तो पहले कार्रवाई क्यों नहीं की गई और अब अचानक लगातार नोटिस क्यों जारी किए जा रहे हैं?
यह मामला अब संपत्ति संबंधी दस्तावेजों, भवन निर्माण की वैधता और निगम की कार्रवाई की निष्पक्षता की जांच का विषय बन गया है।
पुलिस कार्रवाई और झूठे FIR का भी आरोप
शिकायत में दीपक ने निगम के कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों पर पुलिस के माध्यम से परेशान करने का आरोप भी लगाया है। उनका कहना है कि उनके और उनके भाई के खिलाफ कथित रूप से झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई, जिसके बाद उन्हें जमानत लेनी पड़ी। उन्होंने टीआई प्रमोद डडसेना और सफाई निरीक्षक उत्तम दास महंत का भी शिकायत में उल्लेख किया है।
दीपक का दावा है कि जमानत मिलने के बाद भी उन्हें लगातार परेशान किए जाने का सिलसिला जारी रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि 6 अगस्त 2026 से उनके घर और दुकान पर पुलिस भेजकर उन्हें थाने बुलाया जाता रहा, जिसके कारण उन्हें लंबे समय तक कोरबा से बाहर रहना पड़ा।
परिवार की सदस्य की तबीयत बिगड़ने का दावा
शिकायत का सबसे संवेदनशील पहलू परिवार की मानसिक और आर्थिक परेशानी से जुड़ा है। दीपक धामेचा ने आरोप लगाया है कि लगातार नोटिस, दुकान सील होने और पुलिस कार्रवाई के भय के कारण उनके परिवार पर गंभीर मानसिक दबाव पड़ा।
उनके मुताबिक, उनकी भाभी सरस्वती धामेचा की तबीयत बिगड़ने पर 25 अगस्त 2026 को उन्हें कोरबा के एम.जे.एम. अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। हालत में सुधार नहीं होने पर 29 अगस्त को अपोलो अस्पताल, बिलासपुर रेफर किया गया और 3 सितंबर को छुट्टी मिली। शिकायतकर्ता ने अस्पताल के दस्तावेजों को शिकायत के साथ संलग्न करने की बात कही है।
दीपक का आरोप है कि परिवार की इस परेशानी के बावजूद कार्रवाई का सिलसिला नहीं रुका और उनके परिवार को अब भी मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है।
शहर में हजारों भवनों का मुद्दा उठाकर निगम की कार्रवाई पर सवाल
शिकायतकर्ता ने कोरबा शहर में टावर लाइनों और रेलवे की जमीन के आसपास बने भवनों का मुद्दा भी उठाया है। उनका दावा है कि शहर में बड़ी संख्या में आवासीय एवं व्यावसायिक भवन ऐसे हैं, जिनके नियमितीकरण और टैक्स भुगतान की स्थिति की जांच की जरूरत है।
ऐसे में उनका सवाल है कि यदि नगर निगम अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है, तो कार्रवाई सभी प्रभावित संपत्तियों पर समान और पारदर्शी तरीके से क्यों नहीं दिखाई देती? शिकायतकर्ता का आरोप है कि उनकी पंजीकृत और डायवर्टेड जमीनों पर बने भवनों को ही निशाना बनाया जा रहा है।
हालांकि, अन्य भवनों की वैधानिक स्थिति और निगम की कार्रवाई में किसी तरह के भेदभाव के आरोप की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।
मुख्यमंत्री से निलंबन और एफआईआर की मांग
दीपक धामेचा ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि नगर निगम आयुक्त आशुतोष पाण्डेय और भवन अधिकारी भूषण उराव को तत्काल निलंबित किया जाए तथा संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराई जाए। उन्होंने दोष सिद्ध होने पर एफआईआर दर्ज करने और पूर्व में दी गई शिकायतों पर कार्रवाई करने की मांग भी की है।
शिकायत की प्रतिलिपि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, प्रधानमंत्री कार्यालय, केंद्रीय कैबिनेट सचिव, छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नेता प्रतिपक्ष, पुलिस महानिदेशक, पुलिस महानिरीक्षक बिलासपुर, कलेक्टर कोरबा और पुलिस अधीक्षक कोरबा सहित विभिन्न प्राधिकारियों को भेजने का उल्लेख किया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस शिकायत पर निष्पक्ष जांच होगी? क्या नगर निगम और पुलिस प्रशासन दस्तावेजों के आधार पर अपना पक्ष रखेंगे? और क्या यह स्पष्ट हो पाएगा कि संबंधित कार्रवाई नियमों के तहत हुई या शिकायतकर्ता के आरोपों के अनुरूप इसमें किसी प्रकार का व्यक्तिगत द्वेष शामिल था?
फिलहाल, शिकायतकर्ता ने गंभीर आरोपों के साथ कार्रवाई की मांग की है। मामले में संबंधित अधिकारियों का पक्ष और सक्षम प्राधिकारी की जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।





